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थाली में राशन या सेहत से खिलवाड़ ?

डिंडौरी। त्यौहारों का समय हर घर में उम्मीद और खुशियों की एक नई रोशनी लेकर आता है। गरीब से गरीब परिवार भी यह आस लगाता है कि सरकार द्वारा मिलने वाले राशन से कम से कम उसके बच्चों की थाली खाली नहीं रहेगी और चूल्हा जलता रहेगा। लेकिन मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) से सामने आई एक कड़वी हकीकत ने कई मासूम उम्मीदों को ठेस पहुँचाई है। गरीबों के पेट की आग बुझाने के नाम पर शासकीय गोदामों से जो राशन दुकानों तक भेजा जा रहा है, वह न केवल अमानक है, बल्कि सेहत के लिए भी एक बड़ा खतरा बन चुका है।

मासूम बच्चों और बुजुर्गों की सेहत पर भारी बेपरवाही

सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का मुख्य उद्देश्य उन मजबूर और जरूरतमंद परिवारों का सहारा बनना है जो बाजार की महंगाई से लड़कर भरपेट भोजन जुटाने में असमर्थ हैं। लेकिन डिंडौरी के वेयरहाउस से जो राशन शासकीय उचित मूल्य की दुकानों में भेजा जा रहा है, उसे देखकर किसी का भी दिल दहल उठेगा।

सरकारी गोदामों में सालों से बंद पड़ा 4 साल पुराना (वर्ष 2022 का) चावल अब सड़ने लगा है। लंबे समय से सही रखरखाव न होने के कारण चावल के दानों में कीड़े (लूंजी) बिलबिला रहे हैं और कई बोरियों में फफूंद (फंगस) जम चुकी है। सोचिए, जिस राशन से किसी मासूम बच्चे का पोषण होना था, जिस अनाज से किसी बुजुर्ग की भूख मिटनी थी, वही अनाज अब उनके स्वास्थ्य के लिए एक जहर समान साबित हो सकता है।

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मजदूरों की जमीर जागी, जब फटी बोरियों से छलका अमानक अनाज

इस पूरे घटनाक्रम में संवेदनशीलता की पहली मिसाल उन गरीब हमाल और मजदूरों ने पेश की, जो दिन-रात पसीना बहाकर गाड़ियों में राशन लोड करते हैं। कोतवाली के सामने स्थित मध्य प्रदेश वेयरहाउसिंग गोदाम में जब मजदूरों से फटी हुई बोरियों और बदबूदार, फफूंद लगे चावल को ट्रकों में लादने को कहा गया, तो उनका कलेजा कांप उठा।

मजदूरों ने साफ शब्दों में इसका विरोध किया। उनका कहना था कि भले ही वे मजदूरी करते हैं, लेकिन अपनी आंखों के सामने इस कदर खराब और सड़ा हुआ अनाज दूसरों की थाली तक पहुँचाने का पाप वे नहीं कर सकते। जिन बोरियों को छूने तक में संकोच हो, उन्हें गरीब परिवारों के बीच बांटने के लिए भेजा जा रहा था।

आखिर क्यों मौन है जिम्मेदार तंत्र?

खाद्य सुरक्षा के कड़े नियम यह कहते हैं कि गोदाम से राशन की एक भी बोरी बाहर निकलने से पहले उसकी सख्त गुणवत्ता जांच होनी चाहिए। यदि अनाज अमानक या खाने योग्य नहीं है, तो उसे तत्काल अलग कर दिया जाना चाहिए। लेकिन डिंडौरी में इन नियमों को ताक पर रख दिया गया।

निरीक्षण में उजागर हुई सच्चाई: वेयरहाउस में जब गहनता से देखा गया, तो ‘खाद्य राइस मिल’ द्वारा मिलिंग किए गए चावल में कीड़े मिले और ‘नर्मदा राइस मिल’ के चावल में फफूंद लगी पाई गई।

अधिकारियों पर उठे सवाल: इतने बड़े पैमाने पर बिना किसी जांच के सड़ा हुआ राशन दुकानों तक पहुँचाने की तैयारी से प्रशासनिक अधिकारियों और राइस मिलरों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

सवाल सिर्फ पेट का नहीं, इंसानियत का है

गरीबों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें ऐसा अनाज देना जो जानवरों के खाने योग्य भी न हो, केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि एक गंभीर मानवीय अपराध है। त्यौहारों के इस दौर में जब हर परिवार थोड़ी राहत की उम्मीद करता है, तब सड़ा हुआ राशन पाकर उनके दिलों पर क्या बीतती होगी, यह सोचने का विषय है।

अब देखना यह होगा कि शासन और उच्च प्रशासन इस बेपरवाही पर क्या कड़ा कदम उठाता है। क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी? क्या उन मासूम और गरीब परिवारों को साफ और पौष्टिक अनाज मिल पाएगा, जिसका वे हक रखते हैं? या फिर यह फाइलें भी उसी गोदाम की तरह धूल खाती रहेंगी?

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